उधर करनी सेना की करनी गणतंत्र को मुंह बिरा रही है, मैं भैंस को खींचे चले जा रहा हूँ..

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-अभिषेक प्रकाश॥

इस गणतंत्र पर मैं एक बेहद खूबसूरत भैंस के साथ लौटा हूं। डब्बल बॉडी, चमकता श्याम वर्ण,मांसल शरीर चेहरे पर संतुष्टि भरी मुस्कान पर आंखों में बेचैनी लिए यह भैस उज्ज्वल व सशक्त भारत की निशानी है! बस समस्या एक है कि भैंस की काम-इच्छा जग गई है! और यौवन इच्छाओं का जगना विश्वगुरु के लिए संकट की निशानी भी है!
खैर भैंस पद्मावत तो है नही! उसके पास ना कोई रतनसेन है ना कोई ख़िलजी और ना ही जायसी! हां, उसके पास भंसाली और करनी सेना जरूर है!
भैंस के पास जातीय स्वाभिमान जैसी भी कोई बात नही! मनुष्य को छोड़कर किसी भी जाति के पास गर्व करने लायक कुछ है भी तो नही!और भैंस में तो तिरस्कृत और शोषित मजदूर वर्ग का डीएनए है।
मुद्दा भैंस के सेक्स लाइफ से है।कल-परसों भैंस के अंदर का प्यार उमड़-घुमड़ गया।लगी जोर-जोर चिल्लाने,बांय -बांय करने! सामान्य मनुष्य की तरह वो भी घर की दहलीज लांघ जाना चाहती थी!लेकिन इंसान तो इंसान है!फ्री सेक्स या अपने पार्टनर को स्वतः चुनने की स्वतंत्रता तो हमारे मुल्क ने इंसानो को भी अभी पूरी तरह से नही दी फिर ये तो एक अबला जानवर!

मालिक भैंस को लेकर भैंसा ढूढ़ने निकल पड़े हैं।भैस को भैंसा से भैंसियाना’ इसी को कहते हैं!आगे मालिक पीछे भैंस और उसके पीछे पोर्न देखकर रस लेने वाला समाज!

बीच-बीच मे कई भैंसा मिलते भी हैं जो अपने प्रेम का प्रस्ताव भैंस के सामने रखते हैं, लेकिन मालिक को मालूम है कि कौन सा भैंसा उसके लिए उपयुक्त रहेगा! छल हर जगह है।खाली जायसी या पद्मावती ही नही इसके शिकार हैं!बाज़ार का अपना गणित है, जिसमें राजनीति भी है और मुनाफ़ा भी! बाजार उन्मुक्त होना चाहती है लेकिन इसके खिलाडियों की अपनी शर्तें हैं!

मालिक उस भैंसा को ढूढ लाता है! इसकी ख़बर भैंसा मालिक को लगती है तो वह दौड़ा चला आता है।भैंसा मुसलमान है और भैंस हिंदू! लव जिहाद ! हो,हो भारत दुर्दशा देखी न जाई!दोनों के मालिक मार करने पर उतारू हैं!

भैंस-भैंसा प्यार करने का रास्ता बना रहे हैं!पोर्न वाला समाज बगल के बाउंड्री पर बैठ कर प्रेमालाप की कमेंट्री कर रही है।सेक्स एजुकेशन की प्राथमिक शिक्षा भारत में ऐसे ही मिलती हैं।जानवर हमारे गुरु हैं और हम विश्वगुरु!

हिन्दू-मुसलमान होने वाला है! बाहर रोड पर करनी सेना खड़ी है! पुलिस कंट्रोल रूम अपने रेडियो सेट पर चिल्ला रही है–‘जहां भी पद्मावत फ़िल्म लगी हो वहां पर्याप्त फ़ोर्स थाने से लगा दी जाए’।
उधर भैंस प्रेम में अधूरेपन का शिकार हो गई है! हिन्दू पक्ष भैंस की और मुस्लिम पक्ष भैंसा की अस्मिता को बचाने सड़क पर उतर गई हैं! दोनों ओर की सेना अब करनी सेना की तरह सड़क पर आ गई है!

भैंस को पुलिस खींच कर ले जा रही है।प्रेमी भैंसा पीछे दौड़ रहा है और प्रेम में दीवानी भैंस पीछे मुड़ मुड़कर कर देख रही है।

लोकशान्ति भंग हो ही गई है।मद्देनज़र दोनों पक्षों का १५१ कर दिया गया है!

उधर करनी सेना की करनी गणतंत्र को मुंह बिरा रही है मैं भैंस को खींचे चले जा रहा हूं!

(लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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