अमित शाह का इस्तीफा क्यों नहीं होना – चाहिए पर पाठकों की राय

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-संजय कुमार सिंह॥

सीबीआई जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत, उसके कारण, प्रभाव आदि पर जब विवाद हो गया और सारी चीजें खुल कर सामने आ गईं तथा यह तय हो गया कि इस मामले की जांच फिर से कराए जाने पर सुप्रीम कोर्ट में विचार होगा तो मैंने लिखा था की जब शक की सुई सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह पर है तो क्या भाजपा, सरकार और अमित शाह की नौतिक जिम्मेदारी नहीं है कि वे पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दें और तभी जांच हो। फिर जैसी उम्मीद थी, खबर आई कि यह मामला सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्र की अदालत में पहुंचा। हालांकि उन्होंने लोया मामले में दिए आदेश में लिखा है कि मामले को उचित पीठ में लगाया जाए। इसका अर्थ यह है कि यह मामला अब उनके समक्ष नहीं आएगा। या वे सुनना नहीं चाहते हैं। स्पष्ट है कि विवाद के बाद न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्र इस मामले से अलग होना चाहते हैं लेकिन इस मामले में शक की सुई जिसपर है और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उनकी ओर से अभी तक कोई पहल नहीं हुई है।

इस विषय पर मैंने जो कुछ लिखा था उसे फेसबुक पर मीडिया दरबार के पेज से अभी तक 133 लोगों ने शेयर किया है और करीब दो हज़ार  कमेंट और लाइक हैं। बहुत सारे लोग इस मामले में अमित शाह के इस्तीफे की जरूरत नहीं समझते हैं। पुरानी परंपरा रही है कि जिसके खिलाफ जांच होती है, मामला होता है उसे इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि उसे पद पर रहने का लाभ नहीं मिले या वह पद का दुरुपयोग नहीं कर सके। भाजपा साफ तौर पर कह चुकी है कि उसके यहां इस्तीफे नहीं होते पर क्या ऐसा कह देना भर पर्याप्त है। एक जिम्मेदार और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के रूप में उसकी जिम्मेदारी नहीं है कि देश में कानून व्यवस्था का शासन हो, अदालतों के फैसलों पर अमल किया जाए और इसी तरह अदालत में निष्पक्ष फैसलें हों उसकी साख बनी रहे और सरकार या पार्टी में कोई व्यक्ति अपने पद का दुरुपयोग न कर पाए। खास कर किसी अपराध को छिपाने के लिए और अपराध भी ऐसा कि एक मामले को दबाने के लिए उसकी सुनवाई कर रहे जज की हत्या करा देने जैसा गंभीर आरोप हो।

इस मामले में निर्णय तो पार्टी को ही करना है और यह सही है कि ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है पर निष्पक्ष न्याय के लिए आदर्श स्थिति बनाना सरकार की जिम्मेदारी है खासकर तब जब आरोप उसके अध्यक्ष पर हो और पद के दुरुपयोग के मामले परिस्थितजन्य साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हों। आइए देखते हैं जो लोग इसकी जरूरत नहीं समझते उनके क्या तर्क है। आपत्तिजनक और बेमतलब तर्कों को छोड़ दिया गया है। हालांकि, देश की राजनीति और राजनीति को समझने का दावा करते तर्क रहने दिए गए हैं। एक से तर्क कई लोगों के हैं और कुछेक तर्क चर्चित लोगों के नाम से हैं पर उनके नहीं है बल्कि हमनाम के हैं। इसलिए इसमें नाम महत्वपूर्ण नहीं है।

एक जवाब की जगह सवाल है – जब आरएसएस. और सारे भाजपाई मोदी और शाह से आतंकित हों, तो शाह से इस्तीफा मांगने की हिम्मत कौन कर सकता है ? इसपर किसी ने जवाब दिया है, भाजपा की सत्ता मोदीजी से है, पार्टी की वजह से नहीं। इस बात का ख्याल रखो वरना काँग्रेस का सफाया नहीं होता इतनी पुरानी काँग्रेस है। और बात अमित शाह की हो रही हो तो राहुल गांधी कैसे बचेंगे? एक ने लिखा है, सुकन्या के बलात्कारी की भी जाँच हो जाये लगे हाथ तब तक काँग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देंगे क्या राहुल बाबा। इन्हें इस्तीफे से ही मतलब है। जांच से नहीं। ये जानते हैं कि लिखने के लिए लिख रहे हैं इसलिए बलात्कार की जांच हो – ऐसी कोई मांग नहीं करते, नहीं करेंगे।

एक सज्जन कह रहे हैं, जुमलेबाजी नहीं प्रमाण चाहिए होते हैं ,पहले कुछ सबूतों के साथ पहले याचिका तो दायर कीजिए। अब ये कैसी याचिका कैसे सबूत की बात कर रहे हैं, वही जानें। एक सज्जन पूछ रहे हैं जांच कौन करेगा तो दूसरे अखिलेश यादव पर पहुंच गए। कहते हैं, तेरा अखिलेश यादव कैसे संपत्ति वाला हो गया। उसकी भी जांच करा ले। नवल किशोर जी कहते हैं, सब सही है। पहले भाजपा जांच होने दें। बाकी भी जांच कराई जाए। इसपर रवि सिंह राजपूत कहते हैं, भाजपा से पहले कांग्रेस ने 70 सालो तक राज किया है। जितना गड़बड़ घोटाला किया सबकी जांच करा लो फिर भाजपा पर आना। मतलब कोई गुंजाइश नहीं है। यही नहीं, रवि सिंह राजपूत आगे कहते हैं, और हां, नवल किशोर जी, भाजपा के बारे में बोलने से पहले अपने कांग्रेस का इतिहास उठा के देख लो। बोलती बंद हो जाएगी। इनकी यह राय तब है जब लगभग चार साल में भाजपा ने किसी कांग्रेसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। पी चिदंबरम के बेटे के यहां रोज छापा पड़ रहा है लेकिन मिल कुछ नहीं रहा है। खैर।

इसपर आलोक मिश्रा कहते हैं, भक्तों, अपने इतिहास पर एक नजर ड़ालो। जवाब में विष्णु डी जनोलकर लिखते हैं, शाह को कोर्ट ने बरी किया है (राज्यपाल बनाने और हत्या कराने के आरोप से इन्हें मतलब नहीं है) तो दुबारा जांच की अर्जी मतलब अब तक जितने भी काँग्रेस के मामले थे उनकी भी दुबारा जांच होनी चाहिए। इन्हें नहीं मालूम कि भक्त गण यही कह रहे थे कि मुख्य न्यायाधीश ने 1984 के दंगों के संबंध में आदेश दिया था इसीलिए चाच वरिष्ठतम जज उनके खिलाफ हो गए और कैसे वे कांग्रेसी, ईसाई और न जाने क्या क्या और किस-किस गैंग के सदस्य बताये गए। एक साहब ने अपना ज्ञान उड़ेल दिया है, पप्पू और शाह में अंतर इतना ही है कि एक पर जायदाद से जुडा मामला है तो दूसरे पर फौजदारी से जुड़ा मामला है, पहला विपक्ष में बैठा शीर्ष नेता हैं दूसरा सत्ता पक्ष पार्टी का शीर्ष नेता हैं, दूसरा सरकार पर दबाव डाल सकता है जबकि पहला चिल्लाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। हालांकि, इसके बावजूद ये नहीं कहते कि सत्ता पक्ष वाले को इस्तीफा देना चाहिए।

भक्तों की चिन्ता राहुल गांधी और अखिलेश ही नहीं हैं। एक साहब ने लिखा है, लालू यादव भी सजाजाफ्ता होकर अध्यक्ष बने रहे, तब कोई नहीं बोला। डबल सटैंडर्ड क्यों? इनको ये नहीं समझ में आ रहा है कि जानवरों का चारा खाने और आदमखोर होने में अंतर है। यहां अपने खिलाफ मामले की जांच कर रहे जज को मरवा देने का आरोप है। पर भक्ति में दिमाग काम ही नहीं कर रहा है, शायद। संजय चौरसिया ने पूछा है, क्या किसी व्यक्ति पर जज की हत्या का आरोप लगने से व्यक्ति को पद से इस्तीफा देना पड़ता है। या हत्या के आरोप से क्लीन चिट देने का प्रयास करना पड़ता है।? किसी ने और ने कहा है, कोई मामला है ही नहीं, तो इस्तीफा क्यों, जिस मामले में बरी हो चुके हैं वही दुबारा खोलने की कोशिश हो रही है, ये कोशिश तो लगातार होती रहेगी।

इसपर मोहम्मद असीम ने पूछा है, “अगर कोई मामला नहीं है तो दुबारा खुलने से डर क्यों लग रहा है।” यही सवाल मेरा भी है, सत्तारूढ़ दल का अध्यक्ष इस्तीफा देने के बाद इतना कमजोर या निरीह नहीं हो जाएगा कि उसे गलत फंसा दिया जाए। इसपर आलोक शर्मा ने लिखा है, अमित शाह के साथ ही पूरी कांग्रेस पार्टी को भी इस्तीफा देना चाहिए (कहां से पता नहीं) क्योंकि कश्मीरी पंडितों को बेघर करने के गुनहगार हैं ये सब। (काश आलोक भाई ये भी बताते कि भाजपा ने चार साल में ऐसा क्या किया जिससे कश्मीरी पंडित वापस अपने घर में चले गए औऱ कितने चले गए। अशोक अग्रवाल ने कहा है, आप किसी टीम के कैप्टन पर आरोप लगा दें और वो इस्तीफा दे दे जिससे विरोधी का षडयंत्र सफल हो जाए।

प्रभात मिश्रा कहते हैं, एक गलत परम्परा मत डालिए। ये राजनीति है कल किसी पर भी आरोप लगाओ और जांच का निष्कर्ष आने से पहले इस्तीफा मांगों। जब जांच चल ही रही है तो सब्र करो, न्याय का भी यही मूल मंत्र है। शशि कांत तिवारी को चिन्ता है कि श्री लालू जी पर आरोप सिद्ध हो चुका है वो अभी जेल में हैं और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष भी (उन्हें शायद नहीं पता कि इसीलिए तो नीतिश कुमार की अंतरात्मा ने आवाज लगाई और बिहार में सरकार बदल गई। अब राष्ट्रीय जनता दल को कौन पूछ रहा है। फिर भी लालू यादव का अध्यक्ष बने रहना चिन्ता का कारण तो है)। तिवारी जी आगे लिखते हैं, श्री नीतीश जी पर हत्या का आरोप और केस है, जनता दल यू के अध्यक्ष हैं और मुख्यमंत्री, क्या इन लोगों का इस्तीफा नहीं होना चाहिए। इसपर मेरा कहना है, बिल्कुल होना चाहिए पर इसीलिए अमित शाह का न हो यह सही नहीं है।

एक कमेंट यह भी है, “नैतिकता !!! मोदी राज मे अपने शब्दकोष से इसको हटा दीजिये।” मनवेन्द्र सिन्हा बेबाक ने लिखा है, भाजपा में इस्तीफा देने की परम्परा नहीं है मित्रों ! अद्यानंद यादव ने लिखा है, सही सवाल उठाया है आपने। लेकिन नैतिकता का सवाल इनके एजेण्डे मे नहीं है। प्रदीप पाण्डेय ने लिखा है, पप्पू का इस्तीफा भी होना चाहिए नेशनल हेराल्ड मामले में मुचलके पर है उसे क्यों भूल गए भैया। यशवंत सिंह ने लिखा है, चाणक्य नीति के अनुसार, नहीं। अशोक अग्रवाल ने लिखा है, कितनी बार और किस तरह बताया और समझाया जाए कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते बल्कि क्लीन चिट देने की स्वस्थ परंपरा है । आप भी लगे हैं इस्तीफा देना चाइए , नईं देते , क्या …. लोगे ।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. अडवाणी जी ने हवाले के अपराधी की डायरी में नाम के विवाद के आधार पर ही इस्तीफा दे दिया था और वो भी तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही थे-लेकिन अवसरवाद को न यह देखना है न ही समझना।
    कोई भी बीजेपी से जुड़े किसी भी विषय मे बेशक निष्पक्षता से ही क्यों न बोल दे-वह जोम्बी, सेक्युलर, खान्ग्रेसी, आपिया या वामपंथी नाम से नवाज दिया जाता है और तर्क भी कुछ ऐसे ही कि फलां के शासन में भी ऐसा ही हुआ था या ये हुआ था वो हुआ था यानि उसने अपराध किया इसलिये ये भी अपराध के लिये अधिकृत हो गए आदि आदि।

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