दिल्ली में भाजपा की छिछली राजनीति

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-संजय कुमार सिंह॥

मेट्रो का किराया बढ़ने पर नहीं बोलने वाले लोग पानी की कीमत बढ़ने पर बोल रहे हैं। आज जब पर्यावरण की चिन्ता सर्वोपरि है और माना जाता है कि वाहनों (खासतौर से डीजल से चलने वाले) से होने वाला प्रदूषण बहुत ज्यादा है तब सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की अलग अहमियत है। दिल्ली और खासकर एनसीआर के गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद की भौगोलिक और सार्वजनिक परिवहन की स्थिति ऐसी है कि अंतिम मील की यात्रा के लिए कोई कायदे का साधन नहीं होने से मेट्रो का उपयोग करना वैसे भी मुश्किल है। मेट्रो में सीटें कम होने से भी इसकी यात्रा भले कम समय में हो जाती हो, सुखद तो नहीं ही है। और फिर प्लैटफॉर्म तक पहुंचना और प्लैटफॉर्म से बाहर आना स्वस्थ आदमी के लिए भी आसान नहीं है।

ऐसे में मेट्रो चलाने का मकसद ना तो मुनाफा कमाना होना चाहिए ना किराया दूसरे विकल्पों की तुलना में तय किया जाना चाहिए बल्कि बहुत कम होना चाहिए ताकि लोग इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें जिससे सड़कों पर भीड़ और जाम कम हो तथा प्रदूषण की समस्या को भी कुछ राहत मिले। इस आलोक में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मेट्रो का किराया बढ़ाने का विरोध किया तो पार्टी लाइन पर उन्हें अकेला छोड़ दिया गया और किराया आखिरकार बढ़ ही गया जो साधारण नहीं, अच्छी-खासी वृद्धि है। और दैनिक उपयोग करने वाले लोगों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर रही है।

दूसरी ओर, दिल्ली में पानी की कीमत में मामूली वृद्धि पर दिल्ली सरकार का विरोध किया जा रहा है जबकि यह वृद्धि बड़े उपभोक्ताओं के लिए ही है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार यह वृद्धि फरवरी से लागू होने वाली है और 20,000 लीटर प्रति माह खपत करने वाले उपभोक्ताओं के लिए कोई वृद्धि नहीं है या ऐसा कहिए कि इतना पानी मुफ्त मिलता है। इसके बाद 3000 लीटर पानी की कीमत अभी 286.89 रुपए है जो 315.05 रुपए हो जाएगी और यह वृदधि 28.16 रुपए की है। यानी 20,000 लीटर प्रति माह मुफ्त के बाद रोज 100 लीटर पानी खर्च करने वाले के लिए वृद्धि एक रुपए रोज नहीं है। इसका विरोध किया जा रहा है।

विरोध करने वालों में वो लोग भी हैं जो 28 प्रतिशत जीएसटी लगाए जाने का विरोध नहीं कर रहे थे। पेट्रोल की कीमत में बेतुकी वृद्धि का विरोध नहीं करते। गुजरात चुनाव के लिए जीएसटी कम करने में कोई राजनीति या भ्रष्टाचार नहीं देखते। पानी की कीमत में वृद्धि का अंदाजा लगाने के लिए तालिका देखिए। और अखबारों में इसे दिए जा रहे महत्व को देखिए। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे पहले पेज पर छापा है। नवोदय टाइम्स ने तो पहले पेज पर लीड ही बना दिया है और फिर अंदर इतना विस्तार दिया है। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर सिटी पन्ने पर प्रमुखता से विस्तार में छपी है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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